Tuesday, August 18, 2009

पुण्य कब मिलेगा?????

आज की रात भोला के लिए थोड़ा सा चैन लेकर आई है, दिन भर की मजदूरी के बाद थोड़ा-बहुत जो कुछ भी मिला था उससे आज कम से कम अपने बच्चों का और सीता का पेट तो भर पाया था वो। उसका क्या है उसे तो आदत सी हो गई है इन सब की पर हाँ अपने बच्चों और सीता की चिंता उसे रहती ही है, उन्हें भूख में तड़पता नही देख पाता वो। सीता की उसे बहुत फ़िक्र होती है.... आख़िर इस शादी से उसे दे ही क्या पाया था वो। ऐशो-आराम की जिस ज़िन्दगी का वादा किया था उसने सीता से उसे वो पूरा कहाँ कर पाया था। पर सीता भी एकदम अपने नाम के अनुरूप ही थी। पति की खुशी में अपनी खुशी तलाश करना उसे आता था। भोला ने उसे जो कुछ दिया उसमे ही उसने अपनी खुशी पा ली और कभी कुछ न कहा। बिस्तर पर अपने बाजू में भोला ने जब सीता को सोता हुआ पाया तो उसने राहत की साँस ली। कल के दिन की चिंता तो थी ही उसे आख़िर कल जन्माष्टमी पर पूजा का सब समान लाना जो था उसको, पर आज में जीने की आदत हो ही गई थी भोला को क्योंकि ये पहली मर्तबा तो हुआ नही था की दूसरे दिन के खाने की कोई भी व्यवस्था नही थी भोला के पास। वैसे भी मजदूरों को तो रोज़-रोज़ कुआँ खोदने की आदत हो ही जाती है। भोला के मन में ये सब ख़यालात आ ही रहे थे की सीता उठ गई।

सीता- नींद नही आ रही है क्या जी?
भोला- नही.... क्यों तुम्हे भी नही आ रही है क्या?
सीता- हाँ कल की चिंता हो रही है, जो शाम तक कुछ बंदोबस्त नही हो पाया तो कैसे होगा पूजा-पाठ।
भोला- हाँ मैं कुछ तो कर ही लूँगा, पर कल काम ज़्यादा न रहेगा, बच्चों को दिन-भर खाने को क्या देंगे।
सीता- इसकी फ़िक्र मत करिए आप.... कल वैसे भी व्रत रहेगा और बच्चों को भी अब उपास रखने की आदत सी हो गई है। ये व्रत-उपवास तो हम गरीबों के लिए अपने बच्चों को मनाने का एक जरिया ही हैं। अब तो बच्चे खाली थाल देखकर ख़ुद ही समझ जाते हैं की आज उनका उपास है और उपास रखने से भगवान् उनको पुण्य देगा।
भोला- हाँ...... न जाने कब पुण्य देगा भगवान् उनको।

सुबह होते ही भोला काम पर निकल गया। जन्माष्टमी की धूम सब जगह मची हुई थी पर भोला के तो मन में बस एक ही ख्याल था की कहीं काम मिल जाए तो दो-चार पैसे हाथ आयें उनसे पूजा का समान और बच्चों के लिए खाने का बंदोबस्त हो जाए। दिन भर निकल गया और भोला बस काम की तलाश ही करता रहा। घर में बच्चे आज भी समझ ही गए थे की आज व्रत है और पुण्य पाने की अभिलाषा में चुप-चाप भूखे पेट खेलते रहे। मौसम तो सुबह से ही थोड़ा सा ख़राब था और शाम होते-होते और ख़राब हो गया। रात हो आई थी और भोला का कहीं कोई पता नही था। आख़िर भोला आता भी कैसे, त्यौहार के दिन भी अपने बच्चों को भूखा सोते वो नही देख सकता था। मन तो करता था की किसी नदी में जाकर डूब जाए, पर फ़िर बच्चों और सीता का ख़याल आते ही रुक जाता था। भारी मन से उसने घर का रुख लिया। घर भी कैसा.... टीन-टपरे इकठ्ठा कर के सर छुपाने को जो एक जगह बनाई थी उसने उस ही को वो घर कहता था। उदास मन लिए जब वो घर पंहुचा तो सीता ने उसकी आंखों में देखकर ही सारा हाल समझ लिया। रात काफ़ी हो चुकी थी.... बारह बज चुके थे और बारिश बहुत तेज़ थी। लोग मंदिरों में कान्हा के जन्म की खुशियाँ मना रहे थे और भोला के घर में तो आज दिया जलने को तेल भी नही था। बारिश धीरे-धीरे तेज़ हो रही थी और भोला के घर में बारिश का पानी आ रहा था। सीता बच्चों को अपने आँचल में छुपा कर दूसरे कोने में ले आई पर बारिश का पानी धीरे-धीरे कर के पूरे घर में आ गया। अब तो भोला और उसका परिवार बेघर भी हो गए थे। उनकी आंखों के सामने जो कुछ भी थोड़ा-बहुत उनके पास था जिसे वो गृहस्थी कहते थे, सब पानी की भेंट चढ़ गया और भोला ने रोते हुए कहा "कान्हा ये लो हमारी तरफ़ से तुम्हारे जन्मदिन का तोहफा"। मंदिरों से पूजा करके लौट रहे लोगों को इस बात की खुशी थी की उनके व्रत और पूजा का कान्हा उन्हें अच्छा फल देंगे.... पर भोला एक तरफ़ अपने परिवार के साथ बैठा हुआ था बेघर, लाचार..... उसके मन में रह-रहकर बस ये ही ख्याल आ रहे थे "अगर व्रत-उपवास से पुण्य मिलता है तो उसके बच्चे आज भूखे क्यों है, उनको पुण्य कब मिलेगा?"