Sunday, December 19, 2010

क्यों बदनाम स्त्री चरित्रं?????

करके शादी का वादा,
सपने तुमने दिखाए
विश्वास नहीं था,
तो क्यों ज़िन्दगी में आये?

बेपनाह मोहब्बत है,
ये ही तो तुमने कहा था
चले गए तुम,
क्या ये ही हमारे प्यार का फलसफा था?

इश्वर को साक्षी मानकर,
जो तुमने मुझसे वाडे किये
मेरे तन-मन को नोचकर,
फिर क्यों तुम खा गए?

गलत तुमने किया,
षड़यंत्र तुमने रचा
एक कच्ची कलि को तोड़कर-मसलकर,
एक खूबसूरत फूल को क्यों तुमने नहीं बनने दिया?

तुम ही हो जो बर्बाद कर गए,
एक कोमल ज़िन्दगी की सुरम्य सरगम
फिर क्यों बदनाम,
स्त्री चरित्रं?


Thursday, December 16, 2010

ये अदाएं तो हमारी आदत में शुमार हैं.....
जो आप फिसल गए तो हमारा क्या कसूर........

Friday, December 10, 2010

ओस की बूंदों का इन छोटी-छोटी पत्तियों से मिलन , बिलकुल वैसा ही लग रहा है जैसे.......
तुम्हारे लबों का मेरे लबों से........
तुम्हारे मनन का मेरे मनन से.........
और....
हमारे प्रेम का एक दुसरे से........

Thursday, December 9, 2010

चलो हम आज एक घर बनाते हैं,
प्रेम के इंटों से उसे सजाते हैं,
तेरी-मेरी वफ़ा के रंगों से भरा,
चलो आज एक आशियाना बनाते हैं......

Tuesday, December 7, 2010

कमबख्त इस ठण्ड ने आज फिर वो ही सिहरन दी है...........
जो कभी तुम्हारे स्पर्श से हुआ करती थी.....