Tuesday, November 30, 2010

कहीं पर कोई भी न आहट है,
तुमसे मिलने की बहुत चाहत है,
तुम आये भी तो आये किस तरह,
बिखेर गए मेरा सब कुछ इस तरह.........

Monday, November 29, 2010

I still remember you......



walking on the sea shores,
when the waves kiss my feet,
I remember you my love.......

walking on the beaches,
when I see people making sand castle,
I remember you my love......

walking on a river bank,
when I see couples enjoying the atmosphere,
I remember you my love......

there is nothing in this world which does not make me remember you.........

चुप रहने की आदत.....


जब भी हमने अपने मन कोई बात कहने की कोशिश की ....... ये वक़्त कुछ और ही मंज़र दिखता चला गया ...... शायद तब ही से चुप रहने की आदत हो गयी है ......

Saturday, November 27, 2010

मैंने माँ को महसूस किया




आज जब रोटियां बनाते-बनाते मेरे हाथ जल गए,
पर इसकी परवाह किये बिना मैंने पूरा खाना बनाया,
मैंने माँ को अपने अन्दर उतरते महसूस किया!!

आज जब सिलाई करते-करते मेरे हाथ में सुई चुभ गयी,
लेकिन फिर भी मैंने पापा की पूरी कमीज़ की पूरी बांह सिली,
मैंने माँ को अपने अन्दर उतरते महसूस किया!!

आज जब रोटी ख़तम हो जाने पर,
मैंने खुद बासी रोटी खायी,
मैंने माँ को अपने अन्दर उतरते महसूस किया!!

आज जब पापा की दवाइयों का पूरा समय,
मुझे याद हो गया,
मैंने माँ को अपने अन्दर उतरते महसूस किया!!

आज जब खुद की पसंद छोड़,
मुझे सबकी पसंद याद हो गयी,
मैंने माँ को अपने अन्दर उतरते महसूस किया!!

आज जब सबको गर्म खाना खिलाकर,
मैंने खुद ठंडा खाना खाया,
मैंने माँ को अपने अन्दर उतरते महसूस किया!!

आज जब दिनभर के काम के बाद,
मैंने सुबह पांच बजे का अलार्म लगाकर लेती,
मैंने माँ को अपने अन्दर उतरते महसूस किया!!

शायद मैं बड़ी हो रही हूँ.....

Tuesday, November 23, 2010

चाँद और बादल का खेल

कल रात चाँद को बादलों के बीच खेलते देखा ..... चाँद की चान्दिनी भी क्या खूब अपने शबाब पर फैली थी ...... याद रहा था ... कभी मैं भी तुम्हारे आगे -पीछे ऐसे ही खेलती थी ..... और चान्दिनी की तरह हमारा प्यार भी बाहें फैला कर सिमट जाता था .... अरे ये तो सुबह हो गयी ... चाँद , वो बादल सब चले गए .... हमारा प्यार भी ......

Sunday, November 21, 2010

कोरा कागज़

आज बहुत दिनों बाद बैठी हूँ कुछ लिखने... हाथ में एक कलम और फिर से एक कोरा कागज़.... कुछ समझ नहीं आ रहा क्या लिखूं ..... सोचती हूँ कहीं आज फिर से ये कागज़ कोरा ही ना रह जाए.... कभी वो वक़्त भी था जब ऐसे ही अनेकों कागजों पर तुम्हारा और अपना नाम लिखते थकती नहीं थी मैं..... आज मेरे सामने ये कागज़ भी वैसा ही है.... तुम्हारा नाम भी वैसा ही है.... तुम भी वैसे ही हो... तुम्हारा वजूद भी वैसा ही है.... हाँ बस तमन्ना की ज़िन्दगी में नहीं है....