Tuesday, June 21, 2011

मैं हूँ सिर्फ तुम्हारी....

आज दिल फिर ले आया मुझे उस मोड़ पर,
जहाँ मैं खड़ी थी तनहा, अकेली,
लेकर एक गुलाब की पंखुड़ी ,
जिस पर लिखा था नाम बस तुम्हारा......

याद आ गयी मुझे वो दिसम्बर की सर्दी,
होती थी मेरे भीगे लबों पर,
तुम्हारे प्यारे से साथ की अठखेली........

आज न है वो सर्दी न गर्मी,
बस मैं हूँ तन्हां अकेली,
सिर्फ इस इंतज़ार में की तुम आओगे,
क्यूंकि मैं हूँ तुम्हारी सिर्फ तुम्हारी......

Monday, June 20, 2011

काश तू मेरे साथ होता........

ये कुछ पंक्तियाँ मेरे मित्र ने लिखी हैं..... आपके सब को पेश कर रही हु....

काश ..काश तू होता ..हर शाम अगर तू मेरे साथ होता.. डूबते हुए सूरज की लालिमा जेसे तेरे इस हसीं चेहरे को मैं अपने दिल में समां लेता , फूल की पंखडियो जेसी तेरी इस मुस्कराहट को मैं देखता रहता , तेरी एक हंसी के लिए मैं कुछ भी कर जाता ..हर शाम अगर तू साथ मेरे होता .. तो तुम्हे जो पसंद he वो बातें मैं करता , तुम्हे जो पसंद है वो गाना मैं गुनगुनाता , तुम्हे जो है पसंद वो तोहफा मैं तेरे लिए लता......

हर शाम अगर तू साथ मेरे होता ..तो अपने सीने पे सर रखके तुमको मैं सोने देता , आँखों पे आ गई तेरी जुल्फों को मैं कान के पीछे ले जाता , शरबती तेरी इस गुलाबी आँखों को मैं पीता रहता....हर शाम अगर तू साथ मेरे होता बाते तेरे साथ मैं हजारों करता , खूब हंसाता तुमको मैं और मैं भी हँसता, खोये हुए अपने वजूद को मैं कहीं से ढूंढ लाता.......

हर शाम अगर साथ तू मेरे होता .. तो लम्बी सी सड़क पे घुमाने मैं तुमको ले जाता , रास्ते में ice cream और पानीपूरी भी खिलाता , घर तक तुम्हे मैं छोड़ने आता और दुसरे दिन मिलने का वादा मैं लेता ..हर शाम अगर साथ तू मेरे होता .. तो दिल न मेरा यूँ बेबस , उदास होता , चुपचाप तुम्हे याद करके यूँ आन्हे न भरता , आँखों में आंसू के मोती न पिरोता ..ए काश ..काश यूँ होता हर शाम अगर साथ तू मेरे होता .......

Saturday, June 11, 2011

किस्मत का खेल सारा.....

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी।
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी।

एक सूखे पत्ते की तरह,
किस्मत की तेज़ हवाओं में,
ज़िन्दगी ये बहती है......

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी

रेत के कणों की तरह,
किस्मत की तेज़ हवाओं में,
ज़िन्दगी ये फिसलती है......

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी

घने जंगल में जुगनू की तरह,
किस्मत की तेज़ हवाओं में,
ज़िन्दगी ये अपना पथ तलाशती है......

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी

शहीद के गर्व की तरह,
किस्मत की तेज़ हवाओं में,
ज़िन्दगी ये एक दिन अंत हो जाती है......

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी

क्या है मेरा,
क्या तुम्हारा,
सब कुछ बस,
ज़िन्दगी का खेल है न्यारा.......

क्या जीतना,
क्या हारना,
एक दिन सबको,
ख़ुदा के दर पर सिर है झुकाना........

Friday, June 10, 2011

कुछ पंक्तियाँ, बस यूं ही.....

कुछ पंक्तियाँ बन रही हैं ज़ेहन में बस यूं ही...... इनके बारे में आपके जो ख़यालात हैं उनसे वाकिफ ज़रूर करवाईयेगा...... हाँ जी.... तो पंक्तियाँ कुछ यूं हैं की........

जाने कुछ तो है तुम्हारी आँखों में,
जब भी मुझ पर पड़ती हैं,
मेरे अन्दर की नारी लजाने लगती है.....

पत्थर दिल....

तेरे न होने का एहसास भी अब नहीं होता,
तुम कभी न आओगे,
ये सोचकर अब दुःख नहीं होता।

ये वक़्त का इम्तेहान है या..........

मैं बेदर्द हो चुकी हूँ,
तेरे इंतज़ार में थककर,
चूर हो चुकी हूँ।

ये वक़्त का इम्तेहान है या..........

दिल मेरा अब पत्थर बन गया है?????????