आज बहुत दिनों बाद बैठी हूँ कुछ लिखने... हाथ में एक कलम और फिर से एक कोरा कागज़.... कुछ समझ नहीं आ रहा क्या लिखूं ..... सोचती हूँ कहीं आज फिर से ये कागज़ कोरा ही ना रह जाए.... कभी वो वक़्त भी था जब ऐसे ही अनेकों कागजों पर तुम्हारा और अपना नाम लिखते थकती नहीं थी मैं..... आज मेरे सामने ये कागज़ भी वैसा ही है.... तुम्हारा नाम भी वैसा ही है.... तुम भी वैसे ही हो... तुम्हारा वजूद भी वैसा ही है....
हाँ बस तमन्ना की ज़िन्दगी में नहीं है....
... bahut khoob !!!
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