चाँद और बादल का खेल
कल रात चाँद को बादलों के बीच खेलते देखा ..... चाँद की चान्दिनी भी क्या खूब अपने शबाब पर फैली थी ...... याद आ रहा था ... कभी मैं भी तुम्हारे आगे -पीछे ऐसे ही खेलती थी ..... और चान्दिनी की तरह हमारा प्यार भी बाहें फैला कर सिमट जाता था .... अरे ये तो सुबह हो गयी ... चाँद , वो बादल सब चले गए .... हमारा प्यार भी ......
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