Saturday, June 11, 2011

किस्मत का खेल सारा.....

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी।
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी।

एक सूखे पत्ते की तरह,
किस्मत की तेज़ हवाओं में,
ज़िन्दगी ये बहती है......

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी

रेत के कणों की तरह,
किस्मत की तेज़ हवाओं में,
ज़िन्दगी ये फिसलती है......

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी

घने जंगल में जुगनू की तरह,
किस्मत की तेज़ हवाओं में,
ज़िन्दगी ये अपना पथ तलाशती है......

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी

शहीद के गर्व की तरह,
किस्मत की तेज़ हवाओं में,
ज़िन्दगी ये एक दिन अंत हो जाती है......

ये दिन ये रात,
आकर फिर ढल जायेंगी
ये फूल ये कलियाँ,
खिलकर फिर सिमट जायेंगी

क्या है मेरा,
क्या तुम्हारा,
सब कुछ बस,
ज़िन्दगी का खेल है न्यारा.......

क्या जीतना,
क्या हारना,
एक दिन सबको,
ख़ुदा के दर पर सिर है झुकाना........

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